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हवाओ में उड़ने लगी है चटकारे अचार की खुशबू
बाजार में कच्चे आम मिलने लगे है। साथ ही शुरू हो गया है एक से बढ़ कर एक चटपटे मसालेदार अचार बनाने का सिलसिला। आम को देख बचपन की यादें ताज़ा हो जाती हैं। इन यादों में झाँकें तो गर्मी की छुट्टियों का मतलब सिर्फ खेल नहीं था। बल्कि अचार की तैयारीयों के दिन थे। कच्चे आमों की वह खट्टी खुशबू और मसालों की महक पूरे घर में तैरती थी। वह सफेद चादरें, जिन पर नमक-
हल्दी लगी अमिया अपना पानी छोड़ती थी, और हमारा काम होता था उन फाँकों को पलटना और अच्छी तरह से सुखाना। तो लाल मिर्च के तीखेपन से छींक रुकने का नाम नहीं लेती।
अचार - एक उत्सव
हमारे यहाँ अलग-अलग अचार बनाने की परंपरा है। मोहल्ले की छतें और आँगन इस वक्त तरह-तरह के अचारों से आबाद हैं। कहीं सूती चादरों पर आम की फ़ाकियाँ पसरी हैं, तो कहीं दादी-नानी, पापा-मम्मी या बच्चों की चौकन्नी निगाहें बादलों का रास्ता रोक रही हैं। कहीं लाल मिर्च को फाड़ कर उसमें मसाला भरा जा रहा है, तो कहीं कटहल को सुखाया जा रहा है। कहीं अचार की बरनी को
सहजता से धूप में रखा जा रहा है, तो कहीं नीम्बू को धो कर अच्छे से साफ़ किया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश के घरों में अचार बनाना सिर्फ 'कुकिंग' नहीं; एक उत्सव जैसा है। जिसमें आस-पड़ोस के लोग, बड़ी मम्मी से लेकर मासी तक इस उत्सव का हिस्सा होते हैं। तेल से लेकर मसालों तक, सबका बड़ी बारीक़ी से ख़याल रखा जाता है। कुछ भी ऊपर नीचे हुआ तो अचार से हाथ धोना पड़ सकता है। अचार सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि अपने हाथों से आने वाली पीढ़ियों को दिया गया एक 'विरासत' का तोहफा है। जैसे हम सबकी जुबान पर दादी-नानी के बनाये अचार का स्वाद उम्र भर के लिए चढ़ गया है।
अचार का पक्का यार - कच्ची घानी सरसों का तेल
अचार में मिलने वाले मसाले जैसे सौंफ, कलौंजी, मेथी और तीखी लाल मिर्च—अपना जादू तब तक नहीं दिखाते, जब तक उनमें बैल कोल्हू कच्ची घानी सरसों का तेल न पड़ जाए। दादी कहा करती हैं कि "अचार में तेल सिर्फ उसे बचाने के लिए नहीं, उसे पालने के लिए डाला जाता है।" बिल्कुल सही कहती हैं - अगर तेल में दम नहीं, तो अचार की उम्र और स्वाद दोनों कच्चे रह जाते हैं। सरसों का तेल अचार की वह 'रूह' है, जो मसालों के तीखेपन को अपनी मखमली गहराई में समेट लेती है। जिसकी तीखी झांझ अचार की गहराई में समाकर उसमें सही स्वाद भरती है। साथ ही कच्ची घानी सरसों का तेल किसी भी अचार का पक्का यार है जो सालों-साल चलने वाले अचार के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। तब जाकर बनता है वो अचार जो सब्जी-पूड़ी हो, दाल-चावल की सादी थाली हो या सफर में खाये जाने वाला सूखा पराठा—अचार का एक टुकड़ा सब कुछ बदल देता है।
समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदला लेकिन चटकारे अचार की परंपरा नहीं।
अचार बनाने के लिए कच्ची घानी सरसों तेल ही सबसे उपयुक्त तेल क्यों है?
• कच्ची घानी सरसों तेल अपनी विशिष्ट खुशबू के लिए जाना जाता है। यह अचार को प्राकृतिक खुशबू प्रदान करता है।
• अचार बनाने के लिए तेल की गुणवत्ता बेहद मायने रखती है। कच्ची घानी सरसों का तेल निम्न तापमान पर निकाला जाता है, जिससे इसमें सबसे ज्यादा प्राकृतिक गुण रहते हैं। इसलिए यह बिना मिलावट वाला उच्च गुणवत्ता का तेल है।
• शुद्ध सरसों तेल अचार में जान फूंक देता है और उस एसेंस का किसी दूसरे तेल से हासिल
हो पाना नामुमकिन है।
• सरसों तेल एक बाइंडिंग एजेंट की तरह काम करता है, आम के टुकड़ों को मसाला सोखने में मदद करता है।
• अच्छी गुणवत्ता वाला सरसों तेल अचार में सिर्फ स्वाद ही नहीं जोड़ता है, बल्कि यह एक प्राकृतिक प्रिजर्वेटिव के रूप में भी काम करता है। जिससे अचार लंबे समय तक चल सकता है।
• सरसों तेल में एलाइल आइसोथायोसाइनेट जैसे यौगिक होते हैं, जो इसे शक्तिशाली रोगाणुरोधी, एंटीफंगल और एंटीबैक्टिरियल गुण प्रदान करते हैं।
| कच्ची घानी सरसों का तेल | सामान्य सरसों का तेल |
| कम तापमान में दाब | हॉट प्रेस्ड (रासायनिक निस्पंदन) |
| प्राकृतिक पोषक तत्वों से भरपूर | पोषक तत्व खो देता है |
| काले रंग का | पीले रंग का |
| ज़्यादातर एशियाई देशों में उपयोग किया जाता है | आमतौर पर पश्चिमी देशों में उपयोग किया जाता है |
| ज्यादा झांझ (पंजेंसी) पाया जाता | कम झांझ या फिर झांझ नहीं पाया जाता |
